HomeबिहारBihar News- दूसरा फेज झांकी है, मिथिला-कोसी बाकी है, दिख गया कोरोना...

Bihar News- दूसरा फेज झांकी है, मिथिला-कोसी बाकी है, दिख गया कोरोना का खौफ, आगे जुड़ेगा बाढ़ का दंश भी

दूसरे चरण में पटना के दनियावां में वोटर के इंतजार में एक मतदान केंद्र।

चुनाव के दूसरे फेज में 53.98 प्रतिशत वोटिंग। बस! जिन्हें आशंका नहीं थी, वो अपनी जानें। अटल सत्य तो यही था। कोरोना का खौफ जिनके अंदर नहीं था, वही वोट देने निकले। जो कोरोना का खतरा देख-पढ़ चुके या इसका दंश झेल चुके या इसकी कहानियों से नजदीकी तौर पर रू-ब-रू हैं, वह तो नहीं निकले। पटना में कोरोना का सबसे ज्यादा असर था। अब भी है। कोई दिन नहीं गुजरता जब आधा दर्जन मौत न हो। सरकारी सिस्टम आंकड़े छिपा सकता है, जनता के बीच का सच नहीं। इसलिए, पटना में मतदान का सबसे खराब हाल दिखा। जिस बांकीपुर सीट पर जीत-हार का अंतर पूरे बिहार में किसी प्रत्याशी के कुल वोट से अधिक होता था, वहां महज 35.9 प्रतिशत वोटिंग हुई। बख्तियारपुर, फतुहा, मनेर जैसे इलाकों में वोटर निकले, क्योंकि उन्हें कोरोना से खौफ नहीं। विशुद्ध शहरी इलाकों में बूथ के लिए नहीं निकलने वाले जिद पर रहे कि कोरोना में मरने तो नहीं जाएंगे। आरजू-मिन्नत-अभियान सब बेकार। वैसे, दूसरा फेज तो झांकी है। मिथिला-कोसी समेत तीसरे फेज की 78 सीटें बाकी हैं। अभी तो सिर्फ कोरोना का खौफ दिखा है, अंतिम फेज में तो बारिश-बाढ़ का दंश भी जुड़ेगा।

बिहार विधानसभा चुनाव:महामारी के चलते अगर डॉक्टर, बीमार, बुजुर्ग और संक्रमितों के परिवारों ने वोट नहीं डाला तो कुल वोटिंग सिर्फ 40 से 45% ही रहेगी

वोट प्रतिशत की चिंता तो किसी ने नहीं की

सवाल दो हैं। एक- वोट प्रतिशत की चिंता किसी ने की भी थी या नहीं? और, दूसरी- वोट के अभाव का प्रभाव किसपर कैसे पड़ेगा? तो पहले सवाल का जवाब एक लाइन में दे सकते हैं कि राजनीतिक दलों ने तो आमजन की चिंता नहीं की। जदयू को इस महापर्व को समय पर कराने की चिंता थी। राजद विरोध में था भी और तैयार भी। कांग्रेस की भी यही स्थिति थी। भाजपा के अंदर से आवाज आती रही कि अभी टले, लेकिन नीतीश विरोध से बचने के लिए बाहरी तौर पर बोलने से परहेज था। भाजपा के इस दो रूप की वजह जनता तो कतई नहीं थी। होती तो कोरोना के खौफ के बीच निर्वाचन आयोग चुनाव कराने पर अड़ नहीं पाता और सरकारी तंत्र को भी कोरोना को छिपाने की जरूरत नहीं पड़ती। अगर जनता को बचाने के लिए भाजपा स्टैंड लेती तो देश पर राज कर रही इसी पार्टी को शायद वोट प्रतिशत के रूप में फायदा मिलता। पहले चरण के आंकड़ों से खुश होने की जरूरत नहीं, क्योंकि दूसरे चरण ने कोरोना का खौफ साफ दिखा दिया। उन घरों से लोग बिल्कुल नहीं निकले, जिसका किसी-न-किसी रूप में कोरोना से साक्षात्कार हुआ हो। तीसरे चरण में बारिश-बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित रहे इलाकों में चुनाव है। इसलिए, सिरदर्द अभी तो है। दैनिक भास्कर ने तो चुनाव की घोषणा से पहले ही बता दिया था कि वोट प्रतिशत धड़ाम होगा। पिछली बार की तरह 56 प्रतिशत तो नहीं ही जाएगा।

वोट के अभाव का प्रभाव भी काफी हद तक तय

खैर, जो नहीं हुआ उसपर अब सिर फोड़ने से फायदा क्या? लेकिन, सिर तो फूटेगा। भले परिणाम के बाद फूटे। पूत के पांव पालने में दिखे हैं। पहले फेज में 55.69 प्रतिशत मतदान से निर्वाचन आयोग अपने निर्णय पर पीठ ठोक रहा था। अब जवाब दे। उसे मताधिकार छीनने का अधिकार किसने दिया? यह प्रतिशत राजनीतिक दलों की जिद पर चोट है और जब हम इस प्रतिशत के नफे-नुकसान का हिसाब जोड़ने निकलते हैं तो किसी को बम्बामेल वोट पड़ते तो नहीं देख पाते। मतलब, किसी के पक्ष में लहर जैसी कोई बात तो नहीं दिखती है। तो, अब असल सवाल पर आएं कि वोट के अभाव का प्रभाव किसपर पड़ेगा? दरअसल, इसके लिए थर्मामीटर की जरूरत नहीं। बस, यह समझिए कि निकले वोटर आखिर होंगे किनके। कोरोना ने नुकसान हर वर्ग-तबके का किया, लेकिन ग्रामीण इलाकों के लोगों और अपेक्षाकृत कम जागरूक-पढ़े लोग बेखौफ वोट देने निकले। लॉकडाउन और इससे उपजी बेरोजगारी से परेशान लोग गुस्से में वोट देने निकले। जाति-समाज को ध्यान में रखने वाले ज्यादा निकले। जिन्हें 15 साल बनाम 15 साल का हिसाब नहीं करना, वैसे वोटर निकले। हां, हर बार की तरह इस बार भी वोटर निकालकर लाए गए, इसलिए उनकी बात करना बेकार है।

अंत में बस यही कि…लटकला तो गेला बेटा

निकलने वालों को जिन लोगों ने जमीन पर देखा, उनके लिए अनुमान लगाना मुश्किल नहीं कि लक्षण ठीक नहीं। अब तक का मतदान “लटकला तो गेला बेटा” जैसा ही नजर आ रहा है। अब अंतिम फेज से भी बहुत उम्मीद करना बेकार है। मतलब, एक तरह से फरवरी 2005 जैसा कुछ होना तय है। यकीन न हो तो दिवाली का इंतजार कीजिए।

Most Popular