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झारखण्ड वासियों को नहीं मिल रहा बिजली संकट से मुक्ति, जानिए कितना बिजली ज्यादा खपत हो रहा है

झारखंड में बिजली की मांग फिर से रिकार्ड स्तर को छू रही है। आपूर्ति से अधिक मांग होने के कारण 250 से 300 मेगावाट की लोड शेडिंग राजधानी रांची समेत राज्य के अन्य हिस्सों में करना पड़ रहा है। सोमवार को राज्य में पीक आवर में 2500 मेगावाट बिजली की मांग रही। इसके कारण बिजली की आपूर्ति में बाधा आई। राजधानी रांची का भी डिमांड बढ़ गया। सामान्य दिनों में लगभग 250 मेगावाट की मांग रांची के लिए रहती है, लेकिन सोमवार को यह 350 मेगावाट तक पहुंच गया। अन्य स्थानों पर भी डिमांड में अप्रत्याशित बढ़ोतरी देखी गई।

झारखंड बिजली वितरण निगम के मुताबिक रांची के हटिया ग्रिड में 110 मेगावाट की जगह 150 मेगावाट, नामकुम ग्रिड में 90 मेगावाट के स्थान पर 140 मेगावट, गोलमुरी ग्रिड में 50 की जगह 74 मेगावाट और आदित्यपुर ग्रिड में 40 की जगह 60 मेगावाट की मांग रही।

उधर विद्युत उत्पादक संयंत्र टीवीएनएल की बंद यूनिट संख्या एक से सोमवार को उत्पादन आरंभ हो गया। सोमवार को टीवीएनएल से 350 मेगावाट बिजली का उत्पादन हुआ। इसके अलावा एनटीपीसी से 350 मेगावाट, आधुनिक पावर से 100 मेगावाट, विंड एनर्जी से 200 मेगावाट, सोलर एनर्जी से 300 मेगावाट, डीवीसी से 750 मेगावाट, इनलैंड से 50 मेगावाट बिजली की उपलब्धता रही। इसके अलावा पावर एक्सचेंज से 200 मेगावाट बिजली ली गई। इसके बावजूद डिमांड बढ़ने के कारण 300 मेगावाट की कमी हुई।

रांची में स्थापित होगी राज्य स्तरीय जीआइएस लैब

झारखंड सरकार राजधानी रांची में राज्य स्तरीय भौगोलिक सूचना तंत्र (जीआइएस) प्रयोगशाला स्थापित करेगी। इस जीआइएस प्रयोगशाला में झारखंड के विश्वविद्यालयों के अलावा अन्य राज्यों के विश्वविद्यालयों के संबंधित विषयों के विद्यार्थियों को रिमोट सेंसिंग एवं जीआइएस के क्षेत्र में प्रशिक्षण दिया जाएगा। राज्य सरकार ने झारखंड स्पेस अप्लीकेशन सेंटर (जैसेक) के इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति प्रदान कर दी है।

जीआइएस लैब की स्थापना होने से जैसेक द्वारा छात्रों को इंटर्नशिप का भी अवसर प्रदान करेगा। इंटर्नशिप करनेवाले छात्रों को छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाएगी। इसके अलावा राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में कार्यरत अभियंताओं को भी जीआइएस से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाएगा।

बता दें कि जैसेक द्वारा कई विभागों की योजनाओं के लिए जीआइएस मैपिंग का काम किया जा रहा है। जानकारों के अनुसार, इससे योजनाओं की भौतिक प्रगति की सही जानकारी मिल सकती है। साथ ही भावी योजनाएं तैयार करने में भी इसकी मदद ली जा सकती है।

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