झारखंड की सोहराई कला को मिला जीआई टैग, जानिए इस कला के बारे में और क्या होता है जीआई टैग

दीपावली के तोहफे के रूप में झारखंड की सोहराई कला को स्थाई ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) नंबर हासिल हो गया है। तीन नवंबर को इसका प्रमाणपत्र जारी किया गया। मूल रूप से हजारीबाग की सोहराई-कोहबर कला को अब बिहार की मिथिला पेंटिंग, बंगाल के रसोगुल्ला की तरह खास पहचान होगी। साथ ही अब इसके वास्तविक रूप को संरक्षित करने में कानूनी मदद भी मिलेगी।

जियोग्राफिकल इंडिकेशंस रजिस्ट्री (जीआईआर) चेन्नई के असिस्टेंट रजिस्ट्रार एम मोहम्मद हबिवुल्लाह ने सोहराई-कोहवर कला को जीआई टैग प्रमाण पत्र जारी किया है। इससे पहले इस कला को जीआई टैग के लिए सूचीबद्ध किया गया था।

सोहराई को जीआई टैग के लिए पैरवी करने वाले अधिवक्ता चेन्नई के डॉ सत्यजीत सिंह ने बताया कि यह रिकॉर्ड है कि इसे मात्र नौ महीने के भीतर जीआई टैग मिला।

क्या है जीआई टैग

जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग या भौगोलिक संकेत किसी भी उत्पाद के लिए एक प्रतीक चिह्न के समान होता है। यह उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति, विशेष गुणवत्ता और पहचान के आधार पर दिया जाता है।

पीएम कर चुके हैं तारीफ

करीब 5 हजार साल पुरानी झारखंड की आदिवासी सोहराई-कोहबर कला की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने 2015 में हजारीबाग टाउन स्टेशन में की गई सोहराई पेंटिंग की तारीफ की थी।

विदेश तक में है इस कला की धूम

सोहराई-कोहबर कला को आगे बढ़ाने में विदेशी भी मदद करते रहे हैं। फ्रांस की डेडी वोन शॉवेन लगातार विदेशों में इस कला की प्रदर्शनी आयोजित करती रही हैं। इस कला के कद्रदानों में बेल्जियम के मारिश पुरेन, इटली की डेनिला बेजी, जर्मनी की रैट स्कूमबर आदि शामिल हैं। दर्जनों विदेशी पर्यटक इस कला को देखने हजारीबाग आते रहते हैं। विदेशों तक में धूम मचाने वाली इस कला को जीआई टैग देने के लिए हजारीबाग की सोहराई कला महिला विकास सहयोग समिति ने आवेदन किया था।