Live News – हाथरस मामला: मायावती की पार्टी गायब, क्या कांग्रेस को यूपी में मिलेगा फायदा!

नई दिल्ली. जब पूरे देश का ध्यान 30 सितम्बर को बाबरी मस्जिद विध्वंस (Babri Masjid demolition) पर आने वाले निर्णय की तरफ था तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का ध्यान यूपी के हाथरस में 19 वर्षीय दलित लड़की के सामूहिक बलात्कार (Hathras gangrape) ने अपनी तरफ खींच लिया. गैंगरेप के बाद लड़की का मर्डर कर दिया गया जिसकी अस्पताल में मौत हुई.

इस मामले में लखनऊ से लेकर हाथरस तक प्रदर्शन हो रहे हैं और उत्तर प्रदेश प्रशासन और पुलिस का रवैया संवेदनहीन रहा है. प्रदर्शनों के कारण यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को कॉल करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मजबूर होना पड़ा. इसके बाद सीएम योगी ने मामले में आक्रामक निर्णय लिया और पहले जांच के लिए एसआईटी बनाई, इसके बाद पीड़ित परिवार से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बातचीत की.

परिवार के लिए सरकार ने एक सदस्य को सरकारी नौकरी और घर के अलावा पहले से घोषित 10 लाख रुपये की सहायता राशि को बढ़ाकर 25 लाख कर दिया. इसके बाद परिवार को सीएम में भरोसा जगा होगा लेकिन दलित समुदाय और अन्य लोगों का पारा चढ़ा हुआ है. गुस्से का सबसे बड़ा कारण है कि प्रशासन ने जबरन शव का अंतिम संस्कार कर दिया. परिवार को अंतिम दर्शन तक के लिए मना कर दिया गया. इन सबके बीच बड़ा सवाल यही है कि क्यों प्रधानमन्त्री को बीच में आकर हस्तक्षेप करना पड़ा. क्या हाथरस काण्ड राज्य में खराब कानून व्यवस्था और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध का सबूत है या एक बड़ा राजनीतिक आयाम है?

क्या अपने दलित वोट बैंक में संभावित सेंध के बारे में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को थोड़ा चिंतित किया गया है.  योगी सरकार के हाथ से ब्राह्मण वोट खिसकने की खबरों के बाद क्या हाथरस कांड से दलित वोट भी बड़ी संख्या में खिसकेगा. इसका उत्तर भारत के सबसे ज्यादा जनसंख्या और राजनीतिक दृष्टि से अहम राज्य की जातिय व्यवस्था की वास्तविकता से पता चलेगा.जातीय गतिशीलता, वेस्ट यूपी में वाल्मीकि
403 विधानसभा सीटों और 80 लोकसभा क्षेत्रों के साथ, उत्तर प्रदेश में एक बड़ी दलित आबादी है. राज्य जाति-आधारित पहचान की राजनीति का गढ़ भी रहा है. दलित पुनरुत्थान से लेकर पिछड़ी जाति की राजनीति तक, सभी ने यूपी में एक मजबूत अभिव्यक्ति पाई है. विशेषज्ञ बताते हैं कि कुल आबादी में यूपी के 22 फीसदी दलित लोग आते हैं. इसके बाद पुनः वे उपजातियों में बंटे हुए हैं. जाटव, पासी, सोनकर, धोबी, कोइरी और वाल्मीकि इनमें प्रमुख जातियां हैं. वेस्ट यूपी की जनसंख्या में वाल्मीकि हावी है.

गाजियाबाद से लेकर सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, अलीगढ़, हाथरस, अमरोहा, मुरादाबाद आदि जिलों सहित कुल 25 जिलों में वाल्मीकि जाति का प्रभाव है. राजनीतिक रूप से देखा जाए तो जाटव बसपा के मजबूत स्तम्भ माने जाते हैं, तो वाल्मीकि पिछले एक दशक में खिसककर भाजपा के पास चले गए. 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में वाल्मीकि वोट भाजपा के पास गए हैं. भाजपा के साथ उनका लंबा संबंध अब हाथरस बलात्कार और हत्या मामले के बाद खतरे में है, जिसमें पीड़ित परिवार वाल्मीकि समुदाय से है.

क्या भाजपा के नुकसान से कांग्रेस को लाभ?

कांग्रेस उत्तर प्रदेश में लगातार आधार बनाने और पार्टी को मजबूत करने का प्रयास कर रही है. हाथरस इसमें उन्हें एक नया हथियार मिला है. दिल्ली से लेकर हाथरस तक प्रदर्शनों से पार्टी में नई संगठनात्मक ताकत दिखाई दी है. कांग्रेस के एससी/एसटी विंग के नेताओं को लगातार बलात्कार पीड़िता के परिवार के साथ देखा गया था. यूपी कांग्रेस के AICC एससी/एसटी विंग के प्रदीप नरवाल को पीड़ित परिवार के साथ थे.

कांग्रेस के नेता मना करते रहे हैं लेकिन निश्चित रूप से वे दलितों तक अपनी पहुंच और पकड़ बनाना चाहते हैं. खासकर वाल्मीकि समाज, जो अस्सी के दशक तक पार्टी के साथ था, बाद में बसपा से होते हुए भाजपा में चला गया. पार्टी नेताओं का मानना है कि दलित और ब्राह्मण वोटों के अलावा अल्पसंख्यकों के आने से एक मजबूत वोट आधार बन सकता है.

मायावती की पार्टी गायब
हाथरस मामले के बाद 48 घंटों से प्रदर्शन हो रहे हैं और कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त ले ली लेकिन दलितों के उत्थान के लिए बनी बसपा पार्टी गायब है. दिल्ली से उत्तर प्रदेश तक कांग्रेस और भीम आर्मी के लोग सड़कों पर देखे जा सकते हैं. बसपा प्रदर्शनों से पूरी तरह गायब है. पार्टी की मुखिया मायावती का विरोध सिर्फ कुछ ट्वीट तक ही सीमित रहा है. मीडिया के सामने 1 अक्टूबर को मायावती ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि योगी कानून व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहे हैं. उन्हें या तो इस्तीफ़ा देना चाहिए, या भाजपा को उन्हें हटा देना चाहिए. मायवती की देरी से आई प्रतिक्रिया के पीछे दो चिंताएं थी. पहली यह कि दलित वोट बैंक में कांग्रेस का झुकाव और दूसरा यूपी सरकार के प्रति बसपा के नरम रवैये की अवधारणा का मुकाबला करना. मायावती अपने मकसद में कितना सफल होती हैं, यह स्पष्ट नहीं है.