Live News – युद्ध में फंसे अजरबैजान का वो प्राचीन दुर्गा मंदिर, जहां हमेशा जलती रहती है अखंड ज्योति

नई दिल्ली. दुनिया जहां कोरोना वायरस (Coronavirus) से भिड़ने में व्यस्त है, वहीं दो देश आपस में ही भिड़े हुए हैं. ये देश हैं अजरबैजान (Azerbaijan) और आर्मीनिया (Armenia). दोनों देशों के बीच नागोर्नो काराबाख (Nagorno-Karabakh) इलाके को लेकर युद्ध (war) चल रहा है. ये एक ऐसा इलाका है, जो अजरबैजान में स्थित है लेकिन आर्मीनिया इस पर अपना दावा करता रहा है. वैसे बता दें कि अजरबैजान एक मुस्लिम (Muslim) बहुल देश है, जहां की 98% आबादी मुस्लिम है. लेकिन हिंदू (Hindu) धर्म से भी इस देश का पुराना नाता है.

दरअसल आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दुर्गा देवी (Goddess Durga) का एक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर अजरबैजान (Azerbaijan) में स्थित है. यह मंदिर देश के सुराखानी इलाके में स्थित है. हालांकि अब यहां पूजा नहीं होती क्योंकि देश में हिंदू आबादी (Hindu Population) नगण्य है. इस हिंदू मंदिर को वर्तमान में ‘टेम्पल ऑफ फायर’ (Temple of Fire) या ‘आतिशगाह’ के नाम से जाना जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां सालों से लगातार आग जल रही है.

साक्ष्य बताते हैं, भारतीय व्यापारियों ने कराया था मंदिर निर्माण
बता दें कि हिंदू धर्म में अग्नि को बहुत पवित्र माना जाता है. मंदिर की इमारत किसी प्राचीन किले जैसी है. लेकिन मंदिर की छत किसी हिंदू मंदिर जैसी ही है. साथ ही इसकी छत पर देवी दुर्गा के अस्त्रों में सबसे प्रमुख त्रिशूल को भी स्थापित किया गया है. मंदिर के अंदर जो अग्निकुंड है, उससे लगातार आग की लपटें निकलती रहती हैं. मंदिर की दीवारों पर देवनागरी लिपि, संस्कृत और गुरुमुखी लिपि (पंजाबी भाषा) में कुछ लेख भी खोदे गए हैं.माना जाता है कि इस रास्ते से गुजरने वाले भारतीय व्यापारियों ने मंदिर का निर्माण करवाया था. ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक इस मंदिर के निर्माता बुद्धदेव हैं, जो कुरुक्षेत्र के पास के मादजा गांव के रहने वाले थे. मंदिर निर्माण की जो तारीख दीवार पर खुदी है, वह है- संवत् 1783 और मंदिर को बनवाने वालों के जो नाम इस पर लिखे हैं, वे हैं- उत्तमचंद और शोभराज.


साल 1860 के बाद से ही बिना पुजारियों के है मंदिर
ऐतिहासिक साक्ष्यों से ही यह भी पता चलता है कि पहले मंदिर में भारतीय पुजारी हुआ करते थे, जो यहां प्रतिदिन पूजा-पाठ करते थे. पहले लोग भी यहां पर आकर देवी को पूजते थे. जो लोग यहां आते उनमें भारतीय ही ज्यादा होते लेकिन स्थानीय भी यहां पर मनौती मांगते थे. जो साक्ष्य मिलते हैं, उसके मुताबिक यहां के भारतीय पुजारी मंदिर छोड़ 1860 में पलायन कर गए थे. तभी से यह मंदिर बिना पुजारी का है.

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बता दें कि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद अजरबैजान स्वतंत्र देश बना, इससे पहले यह सोवियत संघ का ही हिस्सा था.