Live News – नवरात्रि 2020: मां सती के कुंडल से बना वाराणसी का विशालाक्षी मंदिर, 9 शक्तिपीठों में से है एक

शारदीय नवरात्रि २०२० (Shardiya Navratri 2020/ Navratri 2020 Fifth Day): शारदीय नवरात्रि (Navratri) शक्ति की देवी मां दुर्गा की उपासना का पर्व है. आज नवरात्रि का पांचवा दिन है. पांचवे दिन भक्त मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना कर रहे हैं. नवमी के अगली तिथि को दशमी के दिन दशहरा मनाया जाता है. यह त्योहार बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शारदीय नवरात्रि (Navratri) में माता कैलाश पर्वत से धरती पर अपने मायके आती हैं. हिन्दू धर्म के इस पावन पर्व पर मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा होती है. नवरात्रि में मां की उपासना करने से कई कष्टों का निवारण होकर सुख समृद्धि प्राप्त होती है. ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा इस दौरान अपने भक्तों की पुकार जरूर सुनती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं. शास्त्रकारों से लेकर ऋषि-मनीषियों सभी ने एकमत होकर शारदीय नवरात्र की महिमा का गुणगान किया है. नवरात्र के पावन पर्व पर देवता अनुदान-वरदान देने के लिए स्वयं लालायित रहते हैं.

शक्तिपीठों की कहानी
देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है और ये पवित्र शक्तिपीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर स्थापित हैं. इन 51 शक्तिपीठों के बनने के सन्दर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है. राजा दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व’ नामक यज्ञ का आयोजन करवाया और इस यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव से अपने अपमान का बदला लेने के लिए अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया. भगवान शंकर जी की पत्नी और राजा दक्ष की पुत्री माता सती इस अपमान से पीड़ित हुई और माता सती ने उसी यज्ञ के अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी. इसके बाद भगवान शंकर ने माता सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर उठा करके तांडव करने लगे. भगवान शंकर को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को कई टुकड़ों में काट दिया. माता सती के शरीर के अंग, वस्त्र और आभूषण जहां-जहां गिरे, उन जगहों पर मां दुर्गा के शक्तिपीठ बनें और ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं.

9 शक्तिपीठों में से एक विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

विशालाक्षी शक्तिपीठ अथवा काशी विशालाक्षी मंदिर हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक है. यहां देवी माता सती के दाहिने कान के मणिजड़ित कुंडल गिरे थे. इसलिए इस जगह को ‘मणिकर्णिका घाट’ भी कहते हैं. यह शक्तिपीठ अथवा मंदिर, उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर पतित पावनी गंगा के तट पर स्थित मीरघाट (मणिकर्णिका घाट) पर है. नवरात्रि के सभी नौ दिनों के दौरान मंदिर में विशेष पूजा होती है और शारदीय नवरात्रों में विशेष तौर पर पांचवे दिन से यहां भीड़ अत्यधिक बढ़ जाती है.

मां विशालाक्षी का महत्व
स्कन्द पुराण के अनुसार, ‘मां विशालाक्षी’ नौ गौरियों (नौ देवियों) में पंचम गौरी हैं. ‘मां विशालाक्षी’ को ही ‘मां अन्नपूर्णा’ भी कहते हैं. ऐसा इसलिए कहा जाता है कि ये संसार के समस्त जीवों को भोजन उपलब्ध कराती हैं. ‘मां अन्नपूर्णा’ को ‘मां जगदम्बा’ का ही एक रूप माना गया है.