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Bihar news- Fanishwar Nath Renu 100th Birthday: जन्म शताब्दी वर्ष पर अपने ही घर में बेगाने ‘मैला आंचल’ वाले, जानिए क्यों पद्मश्री को पापश्री कह लौटा दिया था अवार्ड

हाइलाइट्स:

  • आज फणीश्वनाथ रेणु का 100वां जन्मदिन
  • जन्मशताब्दी पर अपने ही घर में बेगाने रेणु
  • अररिया के गांव में प्रशासनिक तौर पर कोई कार्यक्रम नहीं
  • जब पद्मश्री को पापश्री कह लौटा दिया था…
  • राहुल कुमार ठाकुर, अररिया:हिन्दी साहित्य में आंचलिक विधा को जन्म देने वाले फणीश्वरनाथ रेणु किसी परिचय के मोहताज नहीं है।आज अररिया की पहचान विश्व मानस पटल पर है तो वो है रेणु रचित आंचलिक साहित्य को लेकर। 04 मार्च 1921 को औराही हिंगना गांव में जन्मे फणीश्वरनाथ रेणु का यह साल जन्म शताब्दी साल है और इसे यादगार बनाने के लिए भारत समेत विश्व के कई भागों में हिन्दी साहित्य साधकों की ओर से कार्यक्रम किए जा रहे हैं। लेकिन विश्व मानस पटल पर अपनी लेखनी के बदौलत अमिट छाप छोड़ने वाले फणीश्वरनाथ रेणु जन्म शताब्दी के मौके पर अपने ही घर में बेगाने हैं।अपने ही घर में बेगाने रेणुसरकारी स्तर पर रेणु जन्म शताब्दी वर्ष को लेकर प्रशासनिक तौर पर किसी तरह का कार्यक्रम का आयोजन नहीं हो रहा है। हालांकि राज्य सरकार ने वेबिनार के माध्यम से जन्म शताब्दी के मौके पर कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया है, जिसमें रेणु परिवार के साथ साहित्यकार लिंक के माध्यम से शामिल हो पाएंगे।

    कोसी की परती-परिकथा वाली बालूचर भूमि की पगडंडी वाले इलाके में बोली जाने वाली ठेठ गांव-जवार वाली भाषा को शब्दों में पिरोकर हिन्दी साहित्य में नई आंचलिक विधा के सृजनकर्ता रेणु का नाम हिन्दी साहित्य के पुरोधा मुंशी प्रेमचन्द के साथ लिया जाता है। रेणु को अंग्रेजी साहित्य के कथाकार विलियम वर्ड्सवर्थ की लेखनी के समतुल्य माना जाता है।रेणु की रचना न केवल आम बोलचाल वाली बल्कि शब्दचित्र सरीखी मानी जाती है।

    रेणु का परिचय और उनकी जीवनीफणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 04 मार्च 1921 को बिहार के अररिया के औराही हिंगना गांव में हुआ था। वर्तमान का अररिया जिला उस समय पूर्णिया जिला का हिस्सा था और आज रेणु का गांव अररिया जिला और फारबिसगंज अनुमंडल के अंतर्गत आता है। रेणु जी की प्रारंभिक शिक्षा गांव से होते हुए फारबिसगंज में हुई। जिसके बाद वो नेपाल के विराटनगर चले गए और कोईराला परिवार में रहकर मैट्रिक की परीक्षा पास की।

    रेणु के परिवार का कोईराला परिवार के साथ काफी अच्छा संबंध था। मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने उच्च्तर शिक्षा को लेकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़े विद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। रेणुजी में देशप्रेम का जज्बा कूट-कूटकर भरा था। इसी वजह से वो 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।नीतीश की पार्टी ने पहली बार बनाया ‘सवर्ण प्रकोष्ठ’, BJP के कोर वोटर्स पर JDU की नजर?स्वभाव से ही रेणु थे क्रांतिकारी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भागीदारी निभाने के साथ-साथ फणीश्वरनाथ रेणु ने पचास के दशक में नेपाल में राणाशाही के खिलाफ जारी जंग में अपनी भागीदारी जमकर निभाई। रेणु ने न सिर्फ नेपाल में राणाशाही के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में कोईराला परिवार के साथ कदम से कदम मिलाकर आवाज बुलंद की बल्कि सीमाई इलाकों में भारत-नेपाल मैत्री को भी प्रगाढ़ता प्रदान की।

    नेपाल-भारत संबंध में भी निभाई भूमिकानेपाल की दमनकारी राणाशाही के सत्ता के खिलाफ भारत के तराई इलाकों से आंदोलन का सूत्रधार रहे।नेपाल में राणाशाही के खिलाफ जंग के बाद उन्होंने समाजवाद के पुरोधा लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लड़ी जा रही छात्र आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जयप्रकाश नारायण के साथ पटना समेत बिहार और दूसरे अन्य हिन्दी पट्टी क्षेत्र में आपातकाल के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे।

    पद्मश्री को पापश्री का अवार्ड कह लौटायारेणुजी अदम्य जीवटता और कर्मठता वाली शख्सियत थे। वो न तो झुकते थे और न ही रूकते। रेणु को तत्कालीन राष्ट्रपति वराहगिरी वेंकटगिरी ने 21 अप्रैल 1970 को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया था। लेकिन 04 नवम्बर को पटना में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रदर्शन के दौरान जब पुलिस ने निहत्थे लोगों पर लाठियां बरसायीं तो उन्होंने आपातकाल के विरोध में न केवल बिहार सरकार की ओर से मिलने वाली तीन सौ रूपये की पेंशन को लौटा दिया, बल्कि पद्मश्री अवार्ड को भी पापश्री का अवार्ड कह वापस कर दिया। Bihar Politics: राहुल गांधी के बयान पर बोले CM नीतीश कुमार- इमरजेंसी गलत निर्णय, मैं खुद हुआ था शिकाररेणु और उसका साहित्यरेणु की लेखनी ग्रामीण आंचलिकता वाली वर्णनात्मक शैली की थी। पात्र और पृष्ठभूमि भी ग्रामीण शैली के ही थे। वो अपनी लेखनी की बदौलत पात्र और पृष्ठभूमि में जीवंत रूप प्रदान कर देते थे। उनकी कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। चाहे वो बटबाबा की कथा हो या पहलवान की ढोलक। आदिम रात्रि की महक, ठुमरी, दीर्घतपा या फिर उनकी कोई भी रचित कथा बिल्कुल यथार्थ को बताती।

    मैला आंचल से मिली रेणु को सबसे ज्यादा ख्यातिरेणु ने यूं तो कई कहानियों की रचना की, लेकिन उन्हें सबसे अधिक ख्याति मिली मैला आंचल से। 1954 में उनकी महान कृति मैला आंचल का प्रकाशन हुआ। पटना के गांधी मैदान में रेणु की हस्तलिखित किताब मैला आंचल को सबसे पहले महान समीक्षक नलिन विलोचन शर्मा ने पढ़ा तो इसे अलौकिक कृति करार दिया और विभिन्न पत्रिकाओं में समीक्षा आने के बाद राजकमल प्रकाशन ने मैला आंचल का प्रकाशन किया।

    इसके अलावे परती परिकथा, भित्तिचित्र की मयूरी,आदिम रात्रि की महक, ठुमरी, अग्निखोर, अच्छे आदमी, पलटू बाबू का रोड, जुलूस, दीर्घतपा, कितने चौराहे, नेपाली क्रांतिकथा सहित कई कहानियां और अपने संस्मरण को लिख हिन्दी साहित्य को अमूल्य धरोहर दी।

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    रेणु की रचना ‘मारे गए गुलफाम’ पर फिल्म भी बनीरेणु की रचना मारे गये गुलफाम पर तीसरी कसम फिल्म भी बनी। निर्माता निर्देशक बासु भट्टाचार्य और गीतकार शैलेन्द्र ने राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर तीसरी कसम फिल्म का निर्माण किया था। हालांकि भारी कर्ज को लेकर फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक शुरूआती दौर में फिल्म नहीं चल पाने के कारण इतने सदमे में चले गये कि उन्होंने अपने प्राणत्याग दिए। लेकिन बाद में फिल्म सुपर-डुपर हिट साबित हुई। फिल्म के गीत शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने लिखे थे,जबकि संगीत शंकर-जयकिशन का था।

    बाद में धर्मेन्द्र और पद्मा खन्ना के साथ रेणु की लेखनी पर दूसरी फिल्म डागडर बाबू का निर्माण शुरू हुआ और आधी से अधिक फिल्म की रील तैयार भी हो गई लेकिन किसी वजह से फिल्म पूरी नहीं हो पाई।

    कार्यक्रम नहीं हो पाने को लेकर मलालरेणु जन्म शताब्दी के मौके पर हिन्दी साहित्यकारों की ओर से देश-दुनिया में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। लेकिन रेणु के गांव औराही हिंगना में सरकारी स्तर पर वेबिनार को छोड़ किसी तरह के कार्यक्रम का आयोजन नहीं हो रहा है। हालांकि पिछले वर्ष बिहार सरकार ने रेणु जन्म शताब्दी के सौ साल पूरा होने को लेकर रेणु महोत्सव मनाने का निर्णय लिया था और बकायदा इसको लेकर 20 लाख रुपये का फंड भी रिलीज किया गया था, लेकिन कोरोना जैसी विपदा के कारण कार्यक्रम नहीं हो पाया और राशि भी वापस लौट गई।

    रेणु जन्म शताब्दी के मौके पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम नहीं होने से रेणु के चहेतों सहित ग्रामीणों और रेणु परिवार के सदस्यों को मलाल है। रेणु के बड़े पुत्र और पूर्व विधायक पद्म पराग राय वेणु, मंझले पुत्र अपराजित राय अप्पू और सबसे छोटे पुत्र दक्षिणेश्वर राय पप्पू ने ग्रामीण स्तर पर कोेरोना के तहत दिए गए दिशा निर्देश के अनुरूप श्रद्धांजलि सहित अन्य कार्यक्रम के आयोजन किये जाने की बात कही है।

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