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Bihar news- बिहार में कोरोना का कोहराम…खौफ में जीने को मजबूर हैं लोग, सरकार के इंतजाम नजर आ रहे ‘ढाक के तीन पात’

पटनाबिहार में विधानसभा चुनाव कुछ महीने बाद ही कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने एक बार फिर से कहर बरपाना शुरू कर दिया। लगातार संक्रमण के मामले बढ़ने लगे इसके साथ ही महामारी से मरने वालों का आंकड़ा भी रफ्तार पकड़ने लगा। संकट की इस घड़ी में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके हाथ में कोई मदद नहीं है। खौफ और बीमारी से जूझ रहे लोग ‘सिस्टम’ के खिलाफ अपनी आवाज उठाने की कोशिश करना चाहते हैं लेकिन फिर हिम्मत जवाब दे जा रही है। असहाय और निराशा के बीच उन्हें बस खुद बचाव की उम्मीद है।कोरोना संक्रमण से हो रही मौतों के चलते खौफ का स्तर ऐसा है कि लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने से भी डर रहे हैं। जिन्होंने उनके लिए जीवन में सब कुछ बलिदान कर दिया, अब उनकी अंतिम यात्रा में भी शामिल नहीं होना चाहते। ऐसे में हताशा की वजह से कुछ लोग प्रतिक्रिया में कभी-कभी हिंसक तरीका अपना लेते हैं। अस्पताल में तोड़-फोड़ और हंगामा जैसी घटनाएं सामने आती है। ऐसा होने की मुख्य वजह यह है कि उनकी शिकायतों को सुनने और उनका निवारण करने वाला कोई नहीं है। हर जगह पर एक खालीपन नजर आता है।

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पूरे मामले को लेकर जब विपक्ष अपनी आवाज उठाता है, तो सरकार यह कहते हुए उसे खारिज कर देती है कि उन्हें जमीनी हकीकत का पता नहीं है। जोर इसी बात पर देते हैं कि वे रोजाना स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यूजर्स कई तरह से मुद्दों को उठाते हैं और कहते हैं कि सरकार अधिकारियों से फीडबैक लेने के बजाय जमीनी हकीकत देखनी चाहिए।

हालांकि, अकेले सरकार को दोष क्यों दें। इस महामारी के बीच जब अस्पताल में दवाओं और ऑक्सिजन की किल्लत है तो कई ऐसे लोग हैं जो कालाबाजारी करने से भी बाज नहीं आ रहे। ऑक्सिजन और जीवन रक्षक दवाओं को बेचने के लिए ‘आपदा को अवसर’ में बदल दिया है। यहां तक कि जरूरी दवाएं और विटामिन की गोलियां राज्य की राजधानी के कई इलाकों में आउट ऑफ स्टॉक हैं।

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हेल्थकेयर सिस्टम की हालत इतनी गंभीर है कि लोग अपने मरीजों को सरकारी अस्पताल में ले जाने से डरते हैं। अब निजी अस्पताल भी बेहतर नहीं हैं। आम लोगों को एंबुलेंस तक की सुविधा के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है। एक अस्पताल से दूसरे में जाने के लिए एंबुलेंस का कहीं तीन हजार किराया लग रहा तो कई बार उन्हें इससे ज्यादा पैसे देने पर भी सुविधाएं नहीं मिल रहीं। वहीं ऑक्सिजन युक्त एंबुलेंस के लिए मरीज को करीब 7,000 रुपये का तक चुकाना पड़ रहा।

अगर एक अस्पताल में कोई बिस्तर उपलब्ध नहीं है, तो एम्बुलेंस ड्राइवर आपको अगले अस्पताल में ले जाने के लिए फिर से उतने ही पैसे की डिमांड करेगा। सिस्टम इतना असहाय है कि चीजों को नियंत्रित करना इसके दायरे से परे नजर आ रहा है। लेकिन, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मददगार के तौर पर आगे आ रहे हैं, जरूरी सहयोग के लिए सभी तरह के जोखिम उठा रहे हैं।

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बिहार के पूर्व डीजीपी (रिटायर्ट) अभयानंद ने अपने हालिया फेसबुक पोस्ट में भ्रष्टाचार को इस तरह की लाचारी का मूल कारण बताया। उन्होंने अपने पोस्ट में कहा, ‘अगार कोई एक वाक्य है जो इस विभीषिका के मूल में है तो वह है समस्त सरकारी तंत्र में मचा निर्बाध भ्रष्टाचार। आम आदमी ने भ्रष्टाचार से समझौता करना सीख लिया है, इसका विभत्स रूप दिख रहा है।

लेकिन हालात सामान्य होते ही लोग इस कहर को भूल जाएंगे। वे यह नहीं पूछेंगे कि क्या यह सरकार या लोकतांत्रिक प्रणाली की विफलता थी, जिसके लिए हम वोट करते हैं। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर भी मुख्य होता है। जो इस संकट काल में बिहार में बुरी तरह से उजागर हुआ है। कोरोना की पहली लहर थमने के बाद, सरकार ने इसे अपनी सफलता की कहानी के रूप में पेश किया। बिना किसी सरकार का नाम लिए अमेरिका के महामारी विज्ञानी एंथोनी फौसी ने एक भारतीय समाचार पत्र के साथ साक्षात्कार में कहा, ‘जीत को समय से पहले ही घोषित कर दिया गया था।’

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