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रो पड़ा बिहार: धोती-कुर्ता और गंवई ठाठ में चार दशक तक गरीबों की आवाज बने रहे रघुवंश बाबू

दपदप धोती और कुर्ता। पैर में हवाई चप्पल। कंधे पर गमछा। ठंडे में गर्दन से लिपटी खादी की चादर। बिखरे बाल और चेहरे पर मुस्कान। ठेठ भाषण और दिल में उतर जाने वाला गंवई अंदाज। सादगी बिछाते थे और ईमानदारी ओढ़ते थे। यही थे रघुवंश बाबू।  

दुनिया के पहले गणतंत्र की बात आती है तो वैशाली का नाम सामने आता है। जिस वैशाली की धरती पर गौतम बुद्ध का तीन बार आगमन हुआ था उसी वैशाली से रघुवंश बाबू पांच बार सांसद रहे। सादगी भी वैसी ही और विचार भी वैसे ही। अनवरत चलते रहने और लोगों को जगाए रखने की जिद ही थी जो रघुवंश बाबू  इस ‘काली कोठरी’ से भी मुस्कुराते हुए बेदाग निकल गए। उनके साथ ही रहे वीरेन्द्र ने कहा, बुद्ध की तरह वे भी युद्ध के खिलाफ थे। मगर विचारों का पैनापन कभी कम नहीं होने दिया। इसके लिए कई बार उन्होंने अपने ही दल के सुप्रीमो की बेरुखी भी झेलनी पड़ी। इसकी कभी उन्होंने चिंता नहीं की।

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भूजा फांकते और बनाते थे भविष्य की नीति
कई बार उन्होंने कहा भी था कि मुझे खाने-पीने का नहीं बस लोगों को हंसाने का शौक है। और लोग हंसेंगे कैसे जब भर पेट रोटी-दाल मिले। लोकनायक जेपी के साथ ही मैंने खाली पेट ये सपने देखे थे। रघुवंश बाबू के कई सहयोगियों ने बताया कि सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज में जब वे अवैतनिक शिक्षक हुआ करते थे तब कभी शिक्षक तो कभी छात्रों के साथ बैठकर आगे की रणनीति बनाते थे। कॉलेज से उतने पैसे मिलते नहीं थे कि ठीक से रह सकें और बढ़िया भोजन कर सकें। कई दिन भूजा फांककर ही काम चल जाता था, मगर मुस्कुराहट ऐसी की कोई इसे भांप तक नहीं पाता। बाद में कॉलेज को सरकारी मान्यता मिली तो कुछ पैसे मिलने लगे।

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अपना आशियाना न बना सके
रघुवंश बाबू का कोई स्थाई ठिकाना नहीं था। स्वाभाव से यायावर भी नहीं थे।  बस अपना घर नहीं था तो पता कहां का देते। घर वैशाली के शाहपुर गांव में था। मगर राजनीति वहां से की नहीं। नेता तो देश के हुए मगर राजनीतिक कर्मभूमि वैशाली, मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी रही। पांच बार वैशाली के सांसद रहे। राज्य और केन्द्र में मंत्री रहे। मगर मुजफ्फरपुर में हमेशा किराए के मकान में रहे। जब चुनाव आता तो मकान खोजने लगते। उनके कई करीबियों की मानें तो कई बार तो मकान पसंद होने के बावजूद उसे नहीं लेते क्योंकि उसका किराया दो हजार से अधिक होता। कम किराये वाले मकान में रघुवंश बाबू की धुनी रमती। वहीं से चुनाव जीत कर दिल्ली पहुंच जाते। पांच साल सरकारी कोठी में और फिर दो से तीन कमरे के मकान की तलाश शुरू हो जाती।

कई अभियानों में उनके साथ रहे डॉ. निशिन्द्र किंजल्क ने बताया कि मकान और गाड़ी-घोड़ा यानी दिखावा उनकी आदत में ही शुमार नहीं था। लंबे समय तक उनके साथ रहे रघुनाथ प्रसाद गुप्ता ने कहा कि कई बार तो शाम होते ही कहते, अब रहो इसी गांव में। किसी दरवाजे पर बिस्तर लगता और सो जाते।

शहरों से कभी मोह नहीं रहा, गांव से करते थे बहुत प्यार
अस्पताल में भर्ती होने के ठीक पहले रघुवंश बाबू वैशाली स्थित अपने गांव में ही रहते थे। खेती में भी हाथ बंटाते थे। दर्जनों देशों में राजनीतिक दौरा करने वाले रघुवंश बाबू ने कभी दिल्ली या पटना में आशियाना नहीं बनाया। उनके संसदीय क्षेत्र के लोगों ने बताया कि बतौर मंत्री रहते वे गांव में रुक जाते थे। उस समय उनके गाड़ियों का काफिला होता था। चंद घंटे में दिल्ली या पटना पहुंच सकते थे।

वैशाली से लेकर सीतामढ़ी तक रो पड़ा
वैशाली और सीतामढ़ी सहित पूरा देश उनकी इसी सादगी और ईमानदारी का कायल है। रविवार को उनके निधन की खबर आते ही गांव की हर गली रो पड़ी। बूढ़े और जवान बस यही कर रहे थे, आप बहुत याद आएंगे रघुवंश बाबू।

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