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रघुवंश प्रसाद: सच को डंके की चोट पर कहते थे सच, आखिरी सांस तक नहीं चूके

 सच को डंके की चोट पर सच कहते थे। इसीलिए राजनीतिक भीड़ में आखिरी सांस तक सबसे अलग दिखे रघुवंश बाबू। राजद की नीतियों के खिलाफ मुखर हुए। उनकी नजर में जो व्यक्ति सही नहीं था उसकी इंट्री पर आपत्ति जताई। मगर अंतिम क्षण तक जिन दलों से वैचारिक मतभेद रखा  उसका दामन भी नहीं पकड़ा।

जेपी के सिपाही के रूप में उभरने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह 1973 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सचिव बनाए गए थे। 1977 से 90 तक लगातार गैर कांग्रेसी दलों से विधायक रहे। मंत्री भी रहे। उसके बाद जनत दल बना और उसके साथ बने रहे। उस दौरान भी कई बार अपनी ही पार्टी के कुछ नीतियों पर सवाल उठाए। मगर उसका उद्देश्य पार्टी को मजबूती देना होता था। हर बार उनकी बात सुनी जाती और उसे महत्व दिया जाता। अंतिम समय तक भी उनकी गंभीरता और उनका सम्मान दिखता रहा। पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाने पर जब उनसे पूछा जाता तो हर बार यही कहते, ‘जिस पार्टी में मैं रहता हूं वह मेरा घर है। उसे ठीक करना और रखना मेरी जिम्मेदारी है। ’

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राजनीतिक पारी के अंतिम दौर उनके लिए सुकुन भरा नहीं था। मगर वे कभी न टूटे और न ही कभी झुके। वैशाली से पांच बार सांसद रहने के बाद 2014 में वे लोजपा के प्रत्याशी रामा सिंह से चुनाव हार गए। परिणाम बेहद अप्रत्याशित था। फिर 2019 के चुनाव में भी उसी पार्टी की वीणा देवी से चुनाव हार गए। मगर सक्रियता कम नहीं हुई।

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विधानसभा की आहट के बाद रामा सिंह को राजद में लाने की कवायद शुरू हो गई। रघुवंश बाबू ने इसका जमकर विरोध किया। पार्टी सुप्रीमो लालू यादव को भी पत्र लिखकर अपनी भावना से अवगत करा दिया। अन्य कई चीजों को लेकर आहत हुए। इस्तीफा दिया। मगर पत्र लिखने का अंदाज बेहद भावुक। ऐसा दर्द जैसे किसी को अपने घर छोड़कर जाने में होता हो। लालू यादव ने भी इसे स्वीकार नहीं किया। और कई सवाल उठाए। फिर उनके कहीं जाने के कयास का दौर शुरू हुआ। यह उनके लिए और दर्द देना वाली अफवाह थी। हालांकि यह भी सच था कि दूसरी पार्टी रघुवंश बाबू का स्वागत करने को तैयार थी। मगर अंतिम सांस तक वे किसी और पार्टी में जाने को तैयार नहीं हुए। उनके साथ काम करने वाले लोगों की मानें तो वे भले पार्टी छोड़ देते मगर कहीं और जाने का सवाल ही नहीं था।

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