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रघुवंश प्रसाद के निधन पर तेजस्वी का ट्वीट, कहा- अचानक चले गए आप और मुझे अकेला कर गए


वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह का रविवार को दिल्ली एम्म में निधन हो गया। रघुवंश बाबू के निधन से बिहार में शोक की लहर दौड़ उठी। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी ने ट्वटी करते हुए लिखा है कि आदरणीय रघुवंश बाबू! अभी चंद दिन पहले तो एम्स में आपसे बात हुई थी। मेरे द्वारा जल्द स्वस्थ होने की बात कहने पर आपने कहा था जल्द बाहर आकर साथ में कड़ा संघर्ष करेंगे। पिता जी के जेल जाने के बाद आप चंद लोग ही तो ऊर्जा और प्रेरणा देते रहे है। अचानक चले गए आप और मुझे लगभग अकेला कर गए।

तेजस्वी ने अपने ट्वीट में लिखा है कि राजद के मजबूत स्तम्भ, प्रखर समाजवादी जनक्रांति पुंज हमारे अभिभावक पथ प्रदर्शक आदरणीय श्री रघुवंश बाबू के दुःखद निधन पर मर्माहत हूं। आप समस्त राजद परिवार के पथ प्रदर्शक, प्रेरणास्रोत व गरीब की आवाज बने रहे! आपकी कमी राजद व देश को सदैव खलेगी। रघुवंश बाबू की क्रांतिकारी समाजवादी धार राजद के हर कार्यकर्ता के चरित्र में है। उनकी गरीब के प्रति चिंता, नीति, सिद्धांत, कर्म, और जीवनशैली हमेशा हमारे लिए प्रेरणास्त्रोत बनी रहेगी। राजद को अपनी मेहनत और वैचारिक दृष्टिकोण से सिंचने वाले कर्म के धनी महान व्यक्तित्व को सादर नमन।

रघुवंश प्रसाद सिंह लोकदल के जमाने से ही लालू प्रसाद के साथ रहे। कर्पूरी ठाकुर की मौत के बाद कई वरीय नेताओं को दरकिनार कर लालू प्रसाद को नेता बनाने तक में रघुवंश प्रसाद सिंह की बड़ी भूमिका थी। 

राजद के स्थापना काल से ही लालू प्रसाद ने रघुवंश बाबू की किसी सलाह को दरकिनार नहीं किया। आज के राजद में वर्ष 1977 में विधायक बनने वाले लालू प्रसाद के बाद दूसरा नाम रघुवंश बाबू और अब्दुल बारी सिद्दीकी का ही आता है। लिहाजा रघुवंश प्रसाद पार्टी के संकटमोचक के रूप में भी काम करते रहे। यही कारण है कि पार्टी में राबड़ी देवी से ऊपर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में रघुवंश प्रसाद का नाम लालू प्रसाद रखते थे।

विज्ञान के छात्र होने के बाद भी रघुबंश में गंवई छाप लालू की तरह ही रही। केन्द्र में सरकार बनी तो रघुवंश ने ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में जो काम किया आज कांग्रेस भी इसकी कायल रही। आज के मनरेगा की शुरुआत उन्होंने ही नरेगा के रूप में की थी। इस योजना ने कांग्रेस सरकार की साख गरीबों के बीच बढ़ा दी थी। 

यूपीए टू में भी कांग्रेस रघुवंश बाबू को मंत्रिमंडल में लेना चाहती थी लेकिन उन्होंने लालू प्रसाद को छोड़कर मंत्री पद स्वीकारना उचित नहीं समझा। तब लालू प्रसाद भी इस संबंध में पूछने पर यही कहते थे- ‘रघुवंश और जगदा हमको नहीं छोड़ सकते’। लालू भी हमेशा रघुवंश जैसे नेताओं के साथ भी हर पल खड़े रहे। 

हालांकि जगदानंद सिंह कभी मुखर नहीं रहे जबकि लालू प्रसाद जब भी परेशानी में पड़े रघुवंश प्रसाद उनके पक्ष में मुखर रहे। उनकी पीठ पर न सिर्फ खड़े रहे बल्कि उनपर उठने वाले सवालों का जवाब भी खुद दिया। यहां तक कि राजद प्रमुख के पारिवारिक मामलों में उनकी दखल थी। 

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