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रघुवंश प्रसाद और लालू की कर्पूरी काल की राजनीतिक दोस्ती कोराना काल में टूट गई

रघुवंश प्रसाद सिंह लोकदल के जमाने से ही लालू प्रसाद के साथ रहे। कर्पूरी ठाकुर की मौत के बाद कई वरीय नेताओं को दरकिनार कर लालू प्रसाद को नेता बनाने तक में रघुवंश प्रसाद सिंह की बड़ी भूमिका थी। 

राजद के स्थापना काल से ही लालू प्रसाद ने रघुवंश बाबू की किसी सलाह को दरकिनार नहीं किया। आज के राजद में वर्ष 1977 में विधायक बनने वाले लालू प्रसाद के बाद दूसरा नाम रघुवंश बाबू और अब्दुल बारी सिद्दीकी का ही आता है। लिहाजा रघुवंश प्रसाद पार्टी के संकटमोचक के रूप में भी काम करते रहे। यही कारण है कि पार्टी में राबड़ी देवी से ऊपर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में रघुवंश प्रसाद का नाम लालू प्रसाद रखते थे।

विज्ञान के छात्र होने के बाद भी रघुबंश में गंवई छाप लालू की तरह ही रही। केन्द्र में सरकार बनी तो रघुवंश ने ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में जो काम किया आज कांग्रेस भी इसकी कायल रही। आज के मनरेगा की शुरुआत उन्होंने ही नरेगा के रूप में की थी। इस योजना ने कांग्रेस सरकार की साख गरीबों के बीच बढ़ा दी थी। 

यूपीए टू में भी कांग्रेस रघुवंश बाबू को मंत्रिमंडल में लेना चाहती थी लेकिन उन्होंने लालू प्रसाद को छोड़कर मंत्री पद स्वीकारना उचित नहीं समझा। तब लालू प्रसाद भी इस संबंध में पूछने पर यही कहते थे- ‘रघुवंश और जगदा हमको नहीं छोड़ सकते’। लालू भी हमेशा रघुवंश जैसे नेताओं के साथ भी हर पल खड़े रहे। 

हालांकि जगदानंद सिंह कभी मुखर नहीं रहे जबकि लालू प्रसाद जब भी परेशानी में पड़े रघुवंश प्रसाद उनके पक्ष में मुखर रहे। उनकी पीठ पर न सिर्फ खड़े रहे बल्कि उनपर उठने वाले सवालों का जवाब भी खुद दिया। यहां तक कि राजद प्रमुख के पारिवारिक मामलों में उनकी दखल थी। 

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