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भोजपुरी में पढ़ें: जब रघुबंस बाबू कहले रहीं, अगर करपूरी जी जिंदा रहितीं तs 1989 में ऊंहे के बनती परधानमंतरी

घुबंस बाबू परलोक सिधार गईंनी, मन मानते नइखे. लेकिन जवन आंख के सोझा ऊ कइसे झूठ होई. उनकर दरसन कs के जब लौटे लगनी तs उनका साथे बीतावल समय इयाद आवे लागल.  रघुबंस बाबू जइसन गेयानी नेता के गुजरला के बहुते अफसोस रहे. पिछले साल के तs बात हs. करपूरी जी के जयंती पs पटना के मिलर हाई अस्कूल में जलसा भइल रहे. ओहिजा रघुबंस बाबू जवन भाषण देहले रहीं ओकर छाप हमरा दिमाग से कबो ना मेटाई.

ओह भाषण में ऊहां के बतवले रहीं कि अगर करपूरी जी जिंदा रहतीं तs 1989 में बी पी सिंह ना परधानमंतरी बनते. देवी लाल के कहनाम रहे कि 1989 में अगर करपूरी जी जिंदा रहितीं तs ऊंहे के परधानमंतरी बनावल जाइत. एह मौका पर रघुबंस बाबू बतवले रहनी कि ऊंहा के गणित केतना बरियार रहे. अंगुरी पs जोड़ के ऊहां के बता देहनी कि रेलवे के बहाली में दरखास के फीस से सरकार के साढ़े बारह सौ करोड़ रोपेया के अमदनी भइल रहे. रोजी-रोजगार के हालपs जब ऊहां के बोलो लगनी तs जलसा में आइल लोग दम साध के सुनरते रह गइले.

1989 में करपूरी जी बन सकत रहीं परधानमंतरी
रघुबंस बाबू के मोताबिक, करपूरी जी गुजरला के एक साल बाद 24 जनवरी 1989 के उनका जनमदिन पर एही मिलर मैदान में पोरगराम भइल रहे. एकरा में देवीलाल जी अउर चंनरसेखर जी भी आइल रहन. करपूरी जी 1987 से ही राजीव गांधी के सरकार के उखाड़े खातिर तानाबाना बिनत रहीं. देवीलाल जी अउर चनरसेखर जी पटना के एही सभा में संकलप ले ले रहन कि अब दिल्ली के सरकार के खूंटा उखड़ला के बादे दम लिहिल जाई.देवीलाल जी कहले रहन कि करपूरी जी के सपना पूरा करे खातिर कवनो कोर कसर बाकी ना राखल जाई. 1989 के दिसम्बर में राजीव सरकार के बिदाई हो गइल. अगर ओह घरी करपूरी जी जिंदा रहितीं तs ऊंहे के परधानमंतरी बनतीं. रघुबंस बाबू ओह भाषण में कहले रहीं कि करपूरी जी के समाजवादी आंदोलन में एतना तेयाग कइले रहन कि परधानमंतरी के पद उनके मिललs रहितs. बाद में जब बीपी सिंह में झंझट भइल तs देवी जी कहले रहन कि कवनो खांटी समाजवादी के परधानमंतरी बनवले रहितीं तs ई दुरदाशा ना भइल रहितs.


गणित में बेजोड़ रहीं रघबंस बाबू
करपूरी जयंती पs रघुबंस बाबू बेरोजगारियो के बात उठवले रहीं. ऊहां के कहले रहीं, नरेनदर मोदी सरकार तs गरीबन के गेंठी काट लेहलस. रेलवे में 63 हजार भैकेंसी निकलल तs अढ़ाई करोड़ पटीशन पड़ गईल. पांच सौ रोपेया फीस रहे. एह मोताबिक सरकार के बारह सौ करोड़ रोपेया के अमदनी भइल. जब परीक्षा भइल तs बारह लाख लइका इंतिहाने देवे ना गइलन सs. बिहार के लइकन के तिरवेनदरम अउर मदरास सेंटर फेंक देल गइल रहे. गरीब लइकन के जेबी काट के सरकार खजाना भर लेलस. रघुबंस बाबू एतना हिसाह मुंहजबानिये बता देले.

ना कनो कागज ना कवनो पुर्जा. अढ़ईंया सवाई पढ़ के खटाक से बोल देले कि फारम बेच के सरकार के केतना कमाई भइल. ऊहां के कहले रहीं, नरेनदर मोदी रोजगार अउर नोकरी देवे के नाम पs सरकार बनवले रहन. लेकिन नोकरी के हाल ई बा कि इहां पीएचडी कइल लोग चपरासी के फारम भऱे लागलs बाड़े. कुछ साल पहिले सरकार चपरासी के बहाली निकलले रहे. ई बहाली पs 93 बजार दरखास गिर गइल. एकरा में साढ़े सात हजार लोग पीएचडी कइले रहन. पंचवां पास पोस्ट खातिर जब पीएचडी वाला लोग दरखास देत बाड़े तs देश के हाल के अंदाजा लगावल जा सकेला.

नेता ना संत रहन रघुबंस बाबू
रघुबंस बाबू मंतरी रहीं, सांसद रहीं, विधायक रहीं लेकिन उनका जिनगी में कवनो देखावा ना रहे. देहाती दुनिया के सादा जिनगी उनकर खासियत रहे. ऊ काजर को कोठरी में रहन लेकिन कवनो दाग ना लागल. अइसन नेता आज मोसकिले से मिलिहें. उनका आपन गांव के माटी से बहुते लगाव रहे. 2004 में  उहां के मनमोहन सरकार में मंतरी रहीं. एक दिन ऊहां के दिल्ली जाये के खातिर पटना टेशन पहुंचनी तs उनका साथे कपड़ा के एगो मोटरी रहे.

ओकरा में लउका, नेनुआ जइसन कई तरह हरियर तरकारी रहे. जब उनका से केहू एह मोटरी के बारे में पूछलस, तs ऊहां के कहनी, ई हमका खेत में उपराजल तरकारी हs. अइसन सवाद वाला हरियर तरकारी दिल्ली में कहां मिली. सोचनी कि जाते बानी तो घरे के समान लेले चलीं. ई घटना से उनकर सादगी के अंदाजा लगावल जा सकेला. ऊहां के मंतरी रहीं. सुविधा के कवनो कमी ना रहे. लेकिन तब्बो घरे से तरकारी ढो के दिल्ली ले गईनी. मंतरी वाला भीआइपी कलचर से तनिको मतलब ना. ना कवनो लाज ना कवनो परदा. कपड़ा के मोटरी में तरकारी बांध के ले जाये वाला कतना नेता ऐह देश में बाड़े ?

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