बिहार में ई-वेस्ट को लेकर सामने आया कंपनियों का फर्जीवाड़ा, राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने जारी किया नोटिस

बिहार में ई-वेस्ट को लेकर सामने आया कंपनियों का फर्जीवाड़ा, राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने जारी किया नोटिस

बिहार में ई-वेस्ट को लेकर अब तमाम इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसेगा। उन्हें हर जिले में प्रयोग किए हुए उत्पादों को वापस लेने के लिए कलेक्शन सेंटर खोलने होंगे। यह कंपनियां ई-वेस्ट को लेकर कई साल से लगातार टालमटोल कर रही हैं। 

कंपनियों की ओर से एक नहीं दो-तीन बार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कलेक्शन सेंटरों की ऐसी सूची थमा दी गईं, जो कहीं थे ही नहीं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने जब उन सेंटरों की जांच की तो उनमें से अधिकांश फर्जी निकले। अब करीब दर्जनभर कंपनियों को अंतिम चेतावनी देते हुए 20 सितंबर तक की मोहलत दी गई है।

ई-वेस्ट असल में बेहद खतरनाक है। इसके समुचित निस्तारण के लिए ही देश में वर्ष 2016 में ई-वेस्ट मैनेजमेंट पॉलिसी लाई गई। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने कंपनियों को लक्ष्य तय कर दिए। जब राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने कंपनियों से पूछा कि बिहार राज्य से कितने वेस्ट कलेक्शन का लक्ष्य है तो वे बगलें झांकने लगे। उन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्य का हवाला दिया। वर्ष 2018 में कंपनियों की ओर से केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण पर्षद को राज्य में 155 कलेक्शन सेंटर खोले जाने की जानकारी दी गबिहारई। जांच हुई तो सब फर्जीवाड़ा निकला। जो पते दिए गए थे, वहां कुछ नहीं मिला या कोई दूसरा काम होता मिला।

20 सितंबर तक का अल्टीमेटम
बिहार की आपत्ति पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने सख्ती की तो कंपनियों ने फिर 70 कलेक्शन सेंटरों की संशोधित सूची भेजी मगर यह सूची भी सही नहीं निकली। बोर्ड से जुड़े सूत्रों की मानें तो कई कंपनियों ने पटना में एक ही कलेक्शन सेंटर होने की बात कही मगर उसका भी कोई अता-पता नहीं है। अब राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने दर्जनभर प्रमुख कंपनियों को नोटिस जारी किया है। 20 सितंबर तक कंपनियों ने अपने कलेक्शन सेंटरों का सही ब्योरा नहीं दिया तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को उनके खिलाफ कार्रवाई और इंपोर्ट लाइसेंस निरस्त करने को लिखा जाएगा। इसके अलावा 10 और कंपनियों को भी चिन्हित किया जा रहा है।

टालमटोल करती रही हैं कंपनियां
दरअसल ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2016 के आने से पहले कंपनियों को कोई दिक्कत नहीं थी। वो नए उत्पाद बेच देती थीं। पुराने उत्पाद कबाड़ियों के माध्यम से खपाए जाते थे। 2016 के बाद उत्पाद बेचने वाली कंपनियों की ही जिम्मेदारी तय हुई कि प्रयोग किए गए उत्पादों की वापसी और उनका उचित निस्तारण भी उन्हीं को करना है। ऐसे में कंपनियां राष्ट्रीय लक्ष्य का झांसा देकर राज्यों में कलेक्शन सेंटर खोलने में आनाकानी करती आ रही हैं।