नौ दशक पुराना है टाना भगत का आंदोलन, स्वतंत्रता संग्राम के बाद झारखंड में अपने अधिकार के लिए लड़ते रहे

special rajdhani express is standing at daltonganj station since morning due to rail track jam durin

झारखंड में टाना भगतों का आंदोलन करीब नौ दशक पुराना है। जतरा टाना भगत इसके प्रणेता माने जाते हैं। इनके अगुवाई में झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में टाना भगत भू-लगान माफ करने, गौ रक्षा, गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर महात्मा गांधी के अहिंसात्मक आंदोलन में शामिल हुए। आज भी टाना भगत महात्मा गांधी को अपना आदर्श या कहें कि अपना भगवान मानते हैं।

सादगी इनकी जीवन शैली का प्रतीक है। सादे लिबास पहनना वह भी खादी। चाहे स्त्री हो या पुरुष सभी सादे लिबास ही पहनते हैं। अधिकांश लोगों के पैरों में अभी भी चप्पल-जूते नहीं होते। इनका मानना है कि चमड़े से बनी चीजों का हम उपयोग नहीं करेंगे। इनके तिरंगे में आज भी चरखा का निशान होता है। हाथ में प्रतीकात्मक रूप से बना हल होता है और गौ माता और गांधी जी की तस्वीर होती है। टाना भगत मूलतः उरांव जनजातीय समाज से ही आते हैं। इनकी विचारधारा, खानपान और गांधीजी के प्रति अटूट समर्थन, अगाध प्रेम और आस्था इन्हें अलग करता है।

आजादी के आंदोलन में टाना भगतों ने अपने करिश्माई नेता जतरा टाना भगत की अगुवाई में अंग्रेजों को भगाने का काम किया। 1945 में लोहरदगा के कुडू थाने में कब्जा कर उस पर तिरंगा फहराया। जन-जन की जागृति के लिए घंटा पीटने का काम किया। आज भी इनका शृंगार-चरखा बना तिरंगा, हल, घंटा, सफेद लिबास और सादगी ही है। कुडू थाने में आशीर्वाद टाना भगत, लालू टाना भगत आदि की अगुवाई में झंडा फहराया गया था। अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की गई थी। टाना भगतों के आंदोलन का मुख्य केंद्र लोहरदगा जिला हमेशा से रहा है। पुराना रांची जिला जिसमें रांची, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, खूंटी था। मूलतः इसी इलाके में करीब 5000 टाना भगत परिवार रहते हैं। इनकी संख्या करीब 30,000 के आसपास है। आजादी के बाद इनकी जमीन पर सरकार ने टैक्स लगा दिया। इसका टाना भगतों ने आंदोलन के जरिए विरोध किया। लगातार आंदोलन करते रहे। नतीजा यह हुआ कि हाल के दिनों में इनके भू-लगान और शेष को माफ कर दिया गया है। आरंभिक दिनों में लगान तो माफ किया गया था, पर शेष लिया जाता था।

जब झारखंड में पूर्ण बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई, तो उसे भी माफ कर दिया गया। इनके लिए टाना भगत प्राधिकार का गठन राज्य स्तर पर किया गया। इसका उद्देश्य टाना भगतों के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास को करना है। इसके माध्यम से इनको मुख्यधारा में जोड़कर झारखंड के अन्य निवासियों की तरह इन्हें भी तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराना है। हालांकि, टाना भगत फ्री डाउन कानून की मांग को लेकर हमेशा आंदोलनरत रहे हैं। देश के पहले राष्ट्रपति ने इन्हें जहां इनका निवास था। वहां के जल, जंगल और जमीन पर इनका मालिकाना अधिकार दिया था, पर बाद में उसे वापस ले लिया गया। पुर्न बहाली करने के लिए ये आंदोलन में कूदे अब स्थिति यह है कि गांधीवादी सिद्धांत को मानने वाले टाना भगत अहिंसक हैं। गौ रक्षक हैं। राष्ट्र भक्त हैं। कभी भी आंदोलन को इन लोगों ने हिंसक नहीं होने दिया। 

टाना भगत समाज में शिक्षा की कमी है। जागरूकता की कमी है, खेती किसानी में विश्वास करते हैं। शुद्ध शाकाहारी हैं। लहसुन प्याज भी नहीं खाते। प्राधिकार गठन के बाद सरकार ने इनके लिए खजाना खोल दिया है। मुख्यधारा में जोड़ने के लिए इन्हें तमाम सुविधाएं अनुदान पर दिए जा रहे हैं। लोहरदगा जैसे छोटे जिले में करीब 600 से अधिक परिवार हैं। इनमें इनकी संख्या 3731 है। उत्तराधिकारी के आधार पर इनके जमीन का मोटेशन करने का काम शुरू हो गया है। अब तक जिले में 603 परिवारों में 124 का मोटेशन कर दिया गया है। 113 को शत-प्रतिशत अनुदान में प्रधानमंत्री आवास दिया गया है। 40 टाना भगत परिवार को चार-चार दुधारू गाय दिए गए हैं। ट्रैक्टर दिया गया है। सिंचाई के लिए कुछ और तालाब दिए गए हैं। इनकी जीवन शैली में बदलाव लाने का काम किया जा रहा है। टाना भगतों के लिए अलग आवासीय विद्यालय खोले गए हैं।

 समाज के सिर्फ साठ ही ऐसे हैं जो मैट्रिक पास किए हैं। इनके विकास के लिए सरकार कल्याणकारी योजनाओं से इन्हें जोड़ रही है, इनके विकास के लिए सरकार गंभीर और संवेदनशील है। नई पीढ़ी शिक्षा पर विशेष जोर दे रही है। आर्थिक उन्नति के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में फलदार वृक्ष लगाए गए हैं। शहर में लाकर फल बेच रहे हैं। इस तरह टाना भगतों का आंदोलन धीरे-धीरे विकास का आंदोलन बनता जा रहा है। गांधी जी को आदर्श मानने वाले ताना भगत की नई पीढ़ी अब रंगीन कपड़े भी पहन रहे हैं। समझदारी बढ़ा रहे हैं, कुछ लोगों को नौकरी भी मिली है। परिवार की सोच बदल रही है, पर पुराने लोग आज भी अपने आदर्श पर अडिग हैं।  उनका कहना है कि जो जमीन पूर्वजों की थी, उसे वापस दिलाया जाए। दरअसल इस समाज में नेतृत्व का अभाव है। इसलिए आंदोलन में थोड़ा भटकाव नजर आता है, पर अहिंसक नहीं है। सादगी और गांधीवादी सिद्धांत के ये पक्के सिपाही हैं।