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जब मनरेगा मैन रघुवंश प्रसाद सिंह ने यूपीए-2 में सिर्फ इस वजह से ठुकरा दिया था मंत्री बनने का प्रस्ताव

राजनीतिक जीवन में बेबाक और बेदाग अंदाज में रहने वाले प्रखर समाजवादी नेता डॉक्टर रघुवंश प्रसाद सिंह ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (United Progressive Alliance) या यूपीए-2(UPA-2) के शासन में केंद्रीय मंत्री बनने का ऑफर ठुकरा दिया था।

इससे पहले बता दें कि यूपीए-1 शासन काल में केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई में बनी सरकार में रघुवंश प्रसाद सिंह राजद कोटे से केंद्रीय मंत्री बने।  23 मई 2004 से 2009 तक वे ग्रामीण विकास के केंद्रीय मंत्री रहे। इसी बीच 2 फरवरी, 2006 को देश के 200 पिछड़े जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना लागू की गई। वे ही सबसे पहले मनरेगा (महात्मा गांधी न्यूनतम रोजगार गारंटी) स्कीम लेकर आए। हालंकि इस दौरान उन्हें अपने मंत्रीमंडल का ही विरोध झेलना पड़ा।

इसके बावजूद उन्होंने अपनी जिद की वजह से ये योजना लेकर आए।  ये योजना इतनी सफल हुई कि विशेषज्ञ बताते हैं कि यूपीए-2 को दोबारा सत्ता में लाने में  इस योजना की काफी भूमिका रही।

वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल(RJD) कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए से अलग हो गई। हालांकि नतीजों के बाद आरजेडी ने कांग्रेस को बाहर से समर्थन दिया। जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक बार फिर ग्रामीण मंत्रालय की कमान रघुवंश प्रसाद सिंह को देना चाहते थे। लेकिन आरजेडी ने सरकार में शामिल होने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और रघुवंश प्रसाद सिंह ने लालू प्रसाद यादव की दोस्ती की खातिर मंत्री बनने का प्रस्ताव खारिज़ कर दिया।

रघुवंश प्रसाद सिंह का राजनीतिक सफर
6 जून 1946 को वैशाली के शाहपुर में दिग्‍गज नेता और बिहार के वैशाली क्षेत्र के राष्‍ट्रीय जनता दल के सांसद डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह का जन्‍म हुआ था। अपने स्वभाव की वजह से वे राजद के साथ साथ सभी दलों के नेताओं के साथ घुले मिले हुए थे। साइन्स ग्रेजुएट और गणित में मास्टर डिग्री वाली शैक्षणिक योग्यता वाले डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह सीतामढ़ी के एक कॉलेज में गणित पढ़ाते थे।  जेपी आंदोलन से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह 1977 में वह पहली बार विधायक बने और बाद में बिहार में कर्पूरी ठाकुर सरकार में मंत्री भी बने। वह बिहार के वैशाली लोकसभा क्षेत्र से पांच बार सांसद रह चुके हैं। इस बार वे इसी क्षेत्र से जेडीयू नेता से चुनाव हार गये थे।

जेपी आंदोलन से बने संबंध के बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और रघुवंश प्रसाद दोनों एक दूसरे के बेहद करीब भी रहे। जब 1990 में लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री बने तो रघुवंश प्रसाद सिंह को विधान पार्षद बनाया, जबकि वह विधानसभा चुनाव हार चुके थे। वहीं जब एच डी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने तो लालू प्रसाद ने उन्हें बिहार कोटे से मंत्री बनवाया। पर सही मायनों में देखा जाए तो रघुवंश प्रसाद सिंह की राष्ट्रीय राजनीति में पहचान अटल सरकार के दौरान बतौर आरजेडी नेता के रूप मिली। तब लालू प्रसाद बिहार के मधेपुरा से लोकसभा चुनाव हार गये थे। रघुवंश प्रसाद सिंह लोकसभा में पार्टी के नेता बने। 

 

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