Home देश किसान आंदोलन रिटर्न: कौन काटेगा कृषि कानूनों की चुनावी फसल?

किसान आंदोलन रिटर्न: कौन काटेगा कृषि कानूनों की चुनावी फसल?

नई दिल्ली. कृषि हितैषी होने के दावों के बीच मोदी सरकार (Modi Government) के खिलाफ 2014 से लेकर अब तक कई बड़े किसान आंदोलन हो चुके हैं. अब कृषि सुधार कानून के बहाने किसान संगठनों और विपक्षी पार्टियों को एक बार फिर से सरकार के खिलाफ लामबंद होने का बहाना मिल गया है. अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 25 सितंबर को भारत बंद बुलाया है. विपक्षी दलों ने इसे खाद पानी देना शुरू कर दिया है. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar assembly election-2020) सिर पर हैं जहां ज्यादातर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नहीं मिलता, क्योंकि वहां 2016 से ही किसान बाजार के हवाले है. वहां सरकार ने पिछले पांच साल में कुल उत्पादन का एक फीसदी गेहूं भी नहीं खरीदा है. सरकार जेडीयू (JDU) और बीजेपी (BJP) चला रहे हैं.

किसान संगठन बिहार के बहाने केंद्र सरकार के कृषि कानूनों पर सवाल उठा रहे हैं कि बिहार की खुली बाजार व्यवस्था में अन्नदाता 14 साल से परेशान है तो फिर वैसी ही व्यवस्था करके दूसरे राज्यों में कैसे किसी चमत्कार की उम्मीद की जा सकती है. ऐसे में सवाल ये है कि कृषि कानूनों की चुनावी फसल कौन काटेगा?

पूरे देश के किसान कर रहे हैं कृषि बिल का विरोध (File Photo-Twitter/rssurjewala)

सफाई के बावजूद किसानों को विश्वास क्यों नहीं? प्रधानमंत्री से लेकर कृषि मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष तक सभी महत्वपूर्ण लोग लगातार सफाई पर सफाई दे रहे हैं कि एमएसपी कायम रहेगी और मंडियां बंद नहीं होंगी, लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि ये सफाई कानून में एमएसपी देने की गारंटी की बराबरी नहीं कर सकती.

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह कहते हैं कि सरकार ने पहले यूपी वालों से कहा था कि 14 दिन में गन्ने का दाम देंगे वरना ब्याज देंगे, उसे पूरा नहीं किया. आपने कहा था कि किसानों की इनकम डबल होगी, वो बात भी जुबानी थी. आपने कह दिया कि कर्जमाफी करेंगे उसे भी पूरा नहीं किया. इस एक्ट में तो आपने हमसे कोर्ट जाने का भी अधिकार छीन लिया. बाद भी आप कह देंगे हमने तो ऐसे ही कहा था. फिर हम आपकी बात पर कैसे विश्वास करें कि हमें एमएसपी मिलती रहेगी और मंडियां बंद नहीं होगी.

इसलिए किसान आंदोलन करने के लिए विवश हैं. सोमवार एक तरफ राज्यसभा में कृषि बिल पास हुआ तो दूसरी ओर पंजाब और हरियाणा में किसान सड़कों पर उतरकर हंगामा कर रहे थे.

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किसानों को मजबूत या कमजोर क्या बनाएगा कृषि कानून?

सहयोगियों में गुस्सा

इसे लेकर एनडीए की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल से आने वाली केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे चुकी हैं. इसके बाद हरियाणा में किसानों की राजनीति करने वाली जननायक जनता पार्टी पर दबाव बढ़ा हुआ है. जिसके समर्थन की बैसाखी पर राज्य की बीजेपी सरकार टिकी हुई है.

कांग्रेस का क्या फायदा?

सियासत में संख्या बल सबसे अहम होता है. देश में 14.5 करोड़ किसान परिवार हैं. इसका मतलब करीब 50 करोड़ लोग. वे लोग जो गांवों में रहते हैं और सबसे ज्यादा वोट करते हैं. इसलिए विपक्ष और सत्तारूढ़ दल दोनों अपनी किसान हितैषी इमेज बनाने में जुटे हुए हैं. सरकार को घेरने के लिए विपक्ष को रोजगार के बाद सबसे बड़ा मुद्दा किसानों का मिला है.

दाम की सुरक्षा देने से क्यों बच रही सरकार

कृषि कानून के मसले पर पार्टियों के आगे आने से पहले ही पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में किसान आंदोलनरत हैं. किसानों के 180 संगठन सरकार के विरोध में हैं. राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि दुनिया के सभी देशों में किसानों की फसल के दाम की सुरक्षा केवल सरकारें देती हैं. जबकि यहां सरकार इससे बचना चाहती है.

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किसानों की संख्या उनकी बड़ी ताकत है

क्या है किसानों की ताकत  

राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया कहते हैं कि सियासी तौर पर किसान सत्ताधारी और विपक्ष दोनों के लिए काफी अहम हैं. किसानों के बिना न तो अर्थव्यवस्था चल सकती है और न कोई पार्टी सत्ता में बनी रह सकती है. क्योंकि इनके पास वोट की न्यूमेरिकल स्ट्रेंथ है. ऐसे में कोई सरकार या पार्टी काम करे या न करे लेकिन किसानों की बात सभी को करनी पड़ती है.

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