होमझारखंडआखिर टैबलेट्स के बीच में लाइन क्यों दी जाती है?

आखिर टैबलेट्स के बीच में लाइन क्यों दी जाती है?

कोरोना काल में हम सब दवाइयों से काफी हदतक वाकिफ हो गए हैं. उसमें भी अगर टैबलेट की बात की जाए, तो दो किस्म की टैबलेट दिख जाती है. एक ऐसी टैबलेट जिसमें बीच में एक लाइन होती है. एक ऐसी टैबलेट जिसमें कोई भी लाइन नहीं होती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह बीच की लाइन को क्या कहते हैं? आखिर इसका क्या काम होता है? आज के Knowledge पैकेज में हम आपको इसके बारे में बताएंगे…

टैबलेट के बीच बनी लाइन का नाम और इस्तेमाल

दवाइयों के विषय में जानने के लिए हमने दिल्ली की फार्मासिस्ट एकता सिंह से बात की. उन्होंने बताया कि इस लाइन को पिल स्प्लिटर या Debossed Line कहते हैं. यह किसी डिजाइन के लिए नहीं डाली जाती है. दरअसल, इसका अपना इस्तेमाल होता है. हम जिन दवाइयों या टैबलेट्स का इस्तेमाल करते हैं, वह MG में मिलती हैं. जैसे 500 MG, 200 MG या 1000 MG. इन डोज का इस्तेमाल डॉक्टर्स रोग और तकलीफ के हिसाब से करते हैं.

ऐसी स्थिति में जब दवा की डोज ज्यादा हो, लेकिन जरूरत कम हो, तब ये पिल स्प्लिटर काम आता है. इस लाइन के सहारे से दवा की डोज को आधा किया जाता है. इससे दवा आसानी से टूट जाती है. ऐसा करने से दवा के इक्वेशन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है.

लेकिन कुछ टैबलेट्स में ये लकीरें नहीं होती… 

एकता बताती हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है कि सभी टैबलेट्स में पिल स्प्लिटर दिया ही जाए. विशेष कोटिंग युक्त टैबलेट को नहीं तोड़ा जाता है. कुछ ऐसी दवाइयां होती हैं, जिनको फार्मेसी के हिसाब से तोड़कर डोज को कम नहीं किया जा सकता है. ऐसा करने पर उनके इक्वेशन पर असर पड़ता है. ऐसे में उन दवाइयों में पिल स्प्लिटर नहीं दिए जाते हैं. इसलिए किसी भी स्थिति में दवा का सेवन डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए.

पत्ते पर बने लाल लकीर का मतलब

इस Knowledge पैकेज में हम आपको एक एडिशनल जानकारी भी दे देते हैं. आपने देखा होगा कि कुछ दवाइयों के पत्तों के पीछे लाल रंग की लकीर बनी होती है. इसका भी अपना मतलब है. अगर किसी भी टैबलेट के पीछे बनी है, तो इसका मतलब उसे किसी भी स्थिति में डॉक्टर्स के सलाह पर नहीं लेनी चाहिए. उसका अपना एक पूरा कोर्स होता है, जिसके बारे में डॉक्टर बताते हैं.

Source: Zee News

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